भज राम सिया तन्ने जन्म दिया
भज राम सिया तन्ने जन्म दिया..... रघुपति राघव राजा राम
इन अनहद धुनों के साथ सजती थी गाँव की प्रभात बेला ओर पेयजल की समुचित व्यवस्था के उपक्रम के बाद शुरू होता था 60-70 के दशक की महिलाओं और पुरुषों का खेती और घर का दैनिक काम जिसमें पहला काम होता था धन पशुओं की देखभाल और दूध निकालने का....पशुओं की मात्रा भी प्रत्येक घर में इतनी होती थी कि आज के गौरक्षकों की गौशालाएं भी लजा के पानी भरे।
पशुधन या धन की संज्ञा इसीलिए दी गयी के खेती ओर पशुपालन ही जीवन निर्वाह के प्रमुख स्रोत थे और दूध घी दही जैसे उत्पादों से काम आजीविका चला ली जाती थी। पशुधन से प्राप्त बेलों ओर ऊँटो से बिजाई का काम हो जाया करता था और उन्ही से मिली खाद से फर्टीलाइजेशन तब ये कोई मार्केट का मायाजाल थोड़ी था के यूरिया ओर रासायनिक उत्पादों का अंधाधुंध प्रयोग करने की किसी के दिमाग में भी आ जाये। तब मिट्टी में सुगन्ध थी और संतुष्टि थी क्योंकि खेती व्यापार कम पावन कार्य और माँ अन्नपूर्णा का अनुष्ठान ज्यादा होता था।आज की तरह जमीन नशीली नही थी न अधिकाधिक उपज के चक्कर में प्रति एकड़ लागत बढ़ाने का उपक्रम। शून्य खर्च कृषि हुआ करती थी उन बिनपढे पर ज्ञानी लोगों के द्वारा जिसका प्रचार आज की सरकारें तमाम तरह के प्रचार उपक्रम चला के करती हैं।
खेर आइये आपको ले चलता हूँ सुबह की पहली चाय या दूध की तरफ जी हाँ जब पालक जल्दी उठते थे तो बालक उनसे एक कदम आगे थे। एक बड़े से तपेले में जिसे कोई टोपिया कह देता कोई देगची उसमें भर देगची चाय बननी होती थी तो घर के आंगन से लगता एक विशेषीकृत स्थान होता था चूल्हे चौके के लिए।जलावन या बालण के लिए खेजड़ी/खेर/किंकर/बबूल की छंगाई से प्राप्त लकड़ियों ओर गोबर के उपलों को सूखे खींफ या सीणीये से आग पकड़ाकर 6 ईंटो या 3 पत्थरों से बने चूल्हे में पूरा दिन काम लिया जाता था तो उस देगची में चाय चीनी/गुड़ और हल्के से पानी के साथ कोई 20 मिनट की आँच पर पक जाया करती थी घर भर की चाय और बालकों के लिए गर्म दूध...तब बच्चों के लिए चाय पीने पर प्रतिबंध था।
अगर खेती सावणी होती थी तो घर के आधे लोगों की सुबह पहली चाय खेत पे ही होती थी ओर अन्य दिनों में घर पर। इस चाय के बाद दही बिलोने ओर घी प्राप्ति की क्रियाएं हुआ करती और फिर बारी आती थी भोजन की ओर शाम को फिर वही दुग्ध दोहन का उपक्रम ओर उसके बाद रात्रि भोजन।
फिर कहीं लगती थी घर के बाहर की चौकी पर घर के ओर आस पड़ोस के बुजुर्गों की चौपालें ओर अंदर बच्चों को सुलाने हेतु लोरियों का गान।
लगभग 9-10 बजते बजते गाँव सो जाता था क्योंकि अगले दिन सुबह फिर शुरू होनी है वही कहानी...
उठने का अलार्म होगा कुवें पे जुड़ी घिरनी की आवाज ओर किसी बुजुर्ग की आसमान में ढलती "किरत्याँ" पर नजर.....
आप लीजिये इस ब्लॉग का आनन्द ओर मैं चला आपके लिए अगली बार के ग्रामीण उपक्रम की रूपरेखा बनानें....
तब तक के लिए.....
राम राम सा
सुनील खाण्डल "स्वराज"
9772772177

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