इंसानी सभ्यताओं के वास्तविक शिलालेख ओर संग्रहालय बुजुर्ग हैं

 

इंसानी सभ्यताओं के वास्तविक शिलालेख ओर संग्रहालय बुजुर्ग हैं।

आगे कुछ भी पढ़ने से पहले एक बार गहरी नजर से इस चित्र को कुछ मिनट जरूर देखियेगा....



बुजुर्गों के चेहरे पे झुर्रियां उम्र की नही अनुभव की लिखावट है।

उनकी सफेद होती आंख की पुतली में असंख्य छायाचित्र छुपे है सृजन के..

उनके पकते बालों में से झलक पड़ती है कई पीढ़ियों ओर सभ्यताओं की विकास यात्रा।

उनके कांपते हाथों को आदत है उस अनहद नाद को छेड़ने की जिसके वो आदि है..

जी हाँ अनहद नाद कर्म का,परिश्रम का,प्रकृति के निकट होने का..

वो छुड़ाने नही देते पाँव में लगी मिट्टी को कभी भी मैं भांप जाता हूँ मिट्टी ओर उनका इश्क़।

जब साथ छोड़ चुके दाँतो की जगह में धँसते होठो ओर कांपती जीभ से सुर छेड़े जाते हैं.

मैं ओर मेरे हमउम्र एक अलग ही सम्मोहन में उतर जाते हैं उस सुरीली वाणी में

वहाँ गान होता है समय यात्रा का परिवर्तन का

कुछ छूटे कुछ साथ चले किस्सों का।

कभी कभी ये सुर एक ठहराव भी लेता है और उस ठहराव से उठती है एक टीस..

"जमानो बदळ ग्यो र भाया गैया की,मैया की,धर्म की र डोकरा की गत बणावण म लाग गया सगळा"

ये वो शब्द होते हैं जो एक चेतावनी सी लगती है के सावचेत होना पड़ेगा।

क्योंकि जिसने चेतावनी दी है वो ऐसे साक्षी है जो प्रत्यक्षदृष्टा है हर घटना के...

अगली बार जब बुजुर्गों से मिलो तो थोड़ा समय हाथ मे लेके मिलना..

तुम्हारे आंखों के सामने घटित होगी एक समय यात्रा..

प्रत्येक घटना का सिंहावलोकन वो भी निष्पक्ष..

बुजुर्गों की धोती के छिद्र मात्र छिद्र नही है वो पूरा संग्रहालय है तुम्हारी सभ्यता के इतिहास का...

उन छिद्रों से झाँकता है दिव्यगान,समाधान

वो दृष्टि लानी होगी ओर संवाद स्थापित करना होगा...

इन पकती उम्र वाले,झुर्रियों वाले बुजुर्गों से..

तुम्हारा इतिहास ओर समाधान तुम्हारे सामने होता है..

भोले हो जो साधनों में ढूंढते हो.....


सुनील खांडल "स्वराज"


टिप्पणियाँ

  1. मान्यवर आपकी भाषा मे वह अनुभव छिपा है , जिसे मानव युगों युगों से सांस्कृतिक व साहित्यिक संग्रह में उपयोग करता आया है, आप निःसंन्देह एक प्रतिभाशाली लेखक हैं,

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  2. अद्भुत दादा
    कितनी बारीकियां आपने स्पष्ट किया है
    कमाल है

    जवाब देंहटाएं

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